पर्यावरणीय समस्या उभरकर सामने आई है, जिसमें जागेरी तालाब के पायतन क्षेत्र में माइंस पट्टा धारक द्वारा नियमों को ताक पर रखकर बड़े पैमाने पर अवैध खनन किया जा रहा है। इससे न केवल पारिस्थितिक तंत्र को हानि पहुंच रही है, बल्कि स्थानीय समुदाय के लिए जल संकट की आशंका भी गहरा रही है।
अवैध खनन और ओवरबर्डन से बाधित जागेरी तालाब का बहाव क्षेत्र
प्राप्त जानकारी के अनुसार, जागेरी तालाब के प्राकृतिक जलग्रहण क्षेत्र में माइंस धारक द्वारा बिना किसी विधिवत पर्यावरणीय स्वीकृति के खनन कार्य जारी है। खनन से निकले ओवरबर्डन (मिट्टी, पत्थर एवं खनिज अपशिष्ट) को अनियंत्रित रूप से पास के जल बहाव क्षेत्र में डाल दिया गया है, जिससे तालाब की ओर आने वाला वर्षाजल मार्ग पूरी तरह अवरुद्ध हो गया है। यह स्थिति न केवल तालाब के अस्तित्व के लिए खतरा है, बल्कि इससे वर्षा जल के संचयन, भूजल रिचार्ज और आस-पास के खेतों की सिंचाई प्रणाली पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है।

कानूनी और पर्यावरणीय उल्लंघन
राज्य खनन नियमावली, 2015 एवं पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 के तहत जलग्रहण क्षेत्र में खनन गतिविधियाँ प्रतिबंधित हैं। बावजूद इसके संबंधित खनिज पट्टा धारक द्वारा पर्यावरणीय अनुज्ञा की शर्तों की स्पष्ट अवहेलना करते हुए न केवल अवैध खनन किया जा रहा है, बल्कि प्राकृतिक जल प्रवाह को रोककर एक बड़े पारिस्थितिक संकट को जन्म दिया गया है।
स्थानीय जनता में आक्रोश, प्रशासन से कार्रवाई की मांग
इस अवैध गतिविधि से क्षेत्रीय ग्रामीणों एवं किसानों में भारी रोष व्याप्त है। स्थानीय पंचायतों, सामाजिक संगठनों एवं जल संरचना संरक्षण से जुड़े पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने जिला प्रशासन एवं राज्य सरकार से तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है। उन्होंने खनन कार्य पर रोक लगाने, अवैध ओवरबर्डन को हटाने, बहाव क्षेत्र को पुनः दुरुस्त करने एवं दोषियों के विरुद्ध सख्त कार्रवाई की मांग की है।
सरकार एवं विभागों से अपेक्षित कदम राज्य स्तर पर यह अपेक्षा की जा रही है कि:
खनिज विभाग, पर्यावरण विभाग और जल संसाधन विभाग द्वारा संयुक्त सर्वेक्षण कर स्थिति की त्वरित समीक्षा की जाए।
दोषी माइंस धारक पर अविलंब FIR दर्ज कर पट्टा निरस्त किया जाए।
जलग्रहण क्षेत्र की मूल स्थिति बहाल की जाए एवं अवैध रूप से डाले गए ओवरबर्डन को हटाने हेतु आदेश जारी हों।
भविष्य में ऐसे मामलों की पुनरावृत्ति रोकने हेतु निगरानी प्रणाली को सशक्त किया जाए।
तालाब जैसे पारंपरिक जल स्रोतों का संरक्षण केवल पारिस्थितिकी ही नहीं, बल्कि राज्य के जल सुरक्षा और कृषि, पशुपालन आधारित आजीविका के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। अतः खनन विभाग ओर जल संसाधन विभाग सहित राजस्व प्रशासन से यह अपेक्षा की जाती है कि वह बिना विलंब किए इस गंभीर मुद्दे का संज्ञान लेकर ठोस एवं कठोर कार्रवाई करे अन्यथा सचिवालय में उच्च अधिकारियों के समक्ष उपस्थित होकर के उच्च अधिकारियों से जांच की मांग की जाएगी।
दलीप सिंह राजपुरोहित एडवोकेट
जन चेतना पर्यावरण रक्षा समिति
श्री कोलायत
